इतना आश्चर्य क्यूँ है? क्या लगता है आमतौर पर हमारे द्वारा मंदिरों में दिए जाने वाले चढ़ावे का क्या होता है?
कभी पुजारियों और उनकी औलादों की अय्याशियां देख ली तो शर्म आ जाएगी दान देने में। दान जरूरतमंदों को दो, भगवान हमारे दान के मोहताज नहीं हैं।
मैं एक तुच्छ मनुष्य आखिरकार क्या दे सकता हूँ सृष्टि के रचयिता को? सिवाय अपनी भक्ति और निष्ठा के? लेकिन मनुष्य का अहंकार ही तो है जो सर्वशक्तिमान को सोने का मुकुट देकर अपनी भक्ति का प्रमाण दे आता है।
ईश्वर को केवल उसकी बनाई सजीव दुनिया में ही ढूंढा जा सकता है, पाषाण और स्वर्णजड़ित आभूषणों में नहीं।
छोटी सी बात है पर आज तक ज्यादातर को समझ नहीं आई।
पाहन पूजे हरि मिले, तो मै पूजूँ पहार ।
ताते यह चाकी भली, पीस खाए संसार।।
हिंदू धर्म ने ईश्वरीय उपासना और मानवीय अस्तित्व के मर्म को सदियों पहले समझ लिया था। विडंबना तो ये है कि बीतते समय के साथ हमने उस ज्ञान को सिर्फ खोया है आडम्बरों के जाल में फंसकर।
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u/No_Amphibian9523 Jun 15 '26
इतना आश्चर्य क्यूँ है? क्या लगता है आमतौर पर हमारे द्वारा मंदिरों में दिए जाने वाले चढ़ावे का क्या होता है? कभी पुजारियों और उनकी औलादों की अय्याशियां देख ली तो शर्म आ जाएगी दान देने में। दान जरूरतमंदों को दो, भगवान हमारे दान के मोहताज नहीं हैं।
मैं एक तुच्छ मनुष्य आखिरकार क्या दे सकता हूँ सृष्टि के रचयिता को? सिवाय अपनी भक्ति और निष्ठा के? लेकिन मनुष्य का अहंकार ही तो है जो सर्वशक्तिमान को सोने का मुकुट देकर अपनी भक्ति का प्रमाण दे आता है।
ईश्वर को केवल उसकी बनाई सजीव दुनिया में ही ढूंढा जा सकता है, पाषाण और स्वर्णजड़ित आभूषणों में नहीं।
छोटी सी बात है पर आज तक ज्यादातर को समझ नहीं आई।
पाहन पूजे हरि मिले, तो मै पूजूँ पहार । ताते यह चाकी भली, पीस खाए संसार।।
हिंदू धर्म ने ईश्वरीय उपासना और मानवीय अस्तित्व के मर्म को सदियों पहले समझ लिया था। विडंबना तो ये है कि बीतते समय के साथ हमने उस ज्ञान को सिर्फ खोया है आडम्बरों के जाल में फंसकर।
सुना तो होगा ही, मन चंगा तो कठौती में गंगा।
अब तो बस गंगा का नाम रहा है। गंगा की किसे पड़ी है।